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कारक — lesson overview
सम्बन्ध का विचार
कारक वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया तथा अन्य पदों से सम्बन्ध समझने में सहायता करता है।
कर्ता कार्य करने वाले या वाक्यगत कर्तृत्व से जुड़ा पद है; कर्म वह पद है जिस पर क्रिया का प्रभाव पड़ता है, जहाँ संरचना में ऐसा सम्बन्ध हो।
पद का सम्बन्ध केवल शब्द-क्रम से नहीं, अर्थ, विभक्ति और क्रिया-रचना से भी स्पष्ट होता है।
विभक्ति और उदाहरण
हिन्दी में ने, को, से, के लिए और में जैसे परसर्ग सम्बन्धों को व्यक्त कर सकते हैं। एक ही परसर्ग के अलग प्रयोग हो सकते हैं।
“राम ने कलम से पत्र लिखा” में कलम साधन है; “पेड़ से पत्ता गिरा” में से अलग होने का सम्बन्ध बताता है।
इसलिए केवल से देखकर हर बार एक ही कारक घोषित करना उचित नहीं; दोनों वाक्यों का अर्थ अलग है।
प्रयोग में सावधानी
“मुझे पुस्तक दो” में मुझे प्राप्तकर्ता से सम्बन्धित है। “पुस्तक मेज पर है” में पर स्थान का सम्बन्ध बताता है।
कारक और व्याकरणिक लिंग अलग विषय हैं; एक सम्बन्ध व्यक्त करता है, दूसरा शब्द और अन्विति से जुड़ी श्रेणी है।
अभ्यास में पहले क्रिया पहचानें, फिर पूछें कि प्रत्येक पद उससे या दूसरे पद से क्या सम्बन्ध रखता है।
कारक संबंध है; चिह्न उसका संकेत है
कारक संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया अथवा वाक्य के अन्य पदों से संबंध बताता है। परंपरागत विद्यालयी व्याकरण में कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, संबंध, अधिकरण और संबोधन पढ़े जाते हैं। ‘ने, को, से, के लिए, का–की–के, में–पर’ जैसे चिह्न पहचानने में मदद करते हैं, लेकिन केवल चिह्न देखकर हर बार एक ही कारक तय नहीं किया जा सकता।
‘राम को बुलाओ’ में ‘राम’ कर्म है; ‘बच्चे को पुस्तक दो’ में ‘बच्चे’ प्राप्तकर्ता का बोध करा सकता है और सम्प्रदान संबंध बनता है। दोनों जगह ‘को’ है, पर संबंध अलग है। ‘कलम से लिखा’ में साधन होने के कारण करण है, जबकि ‘पेड़ से फल गिरा’ में अलग होने के कारण अपादान है। अर्थगत प्रश्न पूछें: किसने, किसको, किससे या किसके द्वारा, किससे अलग, किसका, कहाँ?
कर्ता के साथ ‘ने’ हमेशा नहीं आता। ‘राम हँसा’ शुद्ध है; हर भूतकालिक क्रिया के आगे ‘ने’ लगाना गलत होगा। इसी तरह हर कर्म के साथ ‘को’ होना अनिवार्य नहीं: ‘सीता ने पुस्तक पढ़ी’ में पुस्तक कर्म है। कारक की पहचान और परसर्ग की उपस्थिति को एक ही बात न मानें।
संबंध और रूप की शुद्धि का अभ्यास
‘सीता की पुस्तक’ में ‘की’ का रूप संबंध रखने वाली वस्तु ‘पुस्तक’ के स्त्रीलिंग से जुड़ता है। ‘सीता का घर’ में वही स्वामी होने पर भी ‘का’ आता है। ‘राम की पुस्तक’ भी शुद्ध है। स्वामी के स्त्री या पुरुष होने से ‘का–की–के’ का रूप अपने-आप तय नहीं होता; संबंधित पद की रचना और वचन देखें।
अधिकरण स्थान या आधार का बोध कराता है: ‘कक्षा में’, ‘मेज पर’। ‘में’ और ‘पर’ कभी अर्थ बदल सकते हैं, इसलिए हर जगह उन्हें समानार्थी न मानें। संबोधन किसी को पुकारता है: ‘हे मित्र!’ संबोधित व्यक्ति केवल पुकारे जाने से वाक्य की मुख्य क्रिया का कर्ता नहीं बन जाता। वाक्य में भूमिकाएँ अलग-अलग जाँचें।
हल करने की क्रमबद्ध विधि है: क्रिया पहचानें, संबंधित संज्ञा या सर्वनाम खोजें, अर्थगत भूमिका बताएँ, फिर चिह्न और रूप की जाँच करें। ‘माँ ने बच्चे को चम्मच से दूध दिया’ में माँ कर्ता, दूध कर्म, बच्चा प्राप्तकर्ता और चम्मच साधन है। एक वाक्य में कई कारक साथ होने से उनके संबंध स्पष्ट दिखते हैं।