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क्रिया — lesson overview

क्रिया का बोध

क्रिया से किसी कार्य के होने, करने या अवस्था का बोध होता है। “रीना पढ़ती है” में पढ़ने का कार्य व्यक्त हुआ है।

वाक्य में मुख्य क्रिया और सहायक क्रिया की भूमिकाएँ अलग हो सकती हैं। “वह पढ़ रहा है” में पूरा क्रिया-पद मिलकर अर्थ देता है।

किसी शब्द को केवल उसका रूप देखकर क्रिया न मानें; देखें कि वह वाक्य में किस प्रकार प्रयुक्त हुआ है।

सकर्मक और अकर्मक

सकर्मक क्रिया का प्रयोग कर्म के साथ होता है, जैसे “मोहन ने पत्र लिखा।” यहाँ पत्र कर्म है।

अकर्मक प्रयोग में वैसा प्रत्यक्ष कर्म नहीं होता, जैसे “बच्चा सो गया।” क्रिया का वर्गीकरण उसके प्रयोग के आधार पर करें।

एक ही धातु का प्रयोग अलग वाक्यों में अलग संरचनाओं में हो सकता है; प्रश्न पूछने की युक्ति सहायक है, पर अर्थ की जाँच भी आवश्यक है।

काल और अन्विति

क्रिया-पद समय, पक्ष और भाव से जुड़ी जानकारी दे सकता है। “पढ़ता है”, “पढ़ रहा है” और “पढ़ चुका है” का अर्थ एक जैसा नहीं।

लिंग, वचन, पुरुष और वाक्य की कारक-रचना क्रिया के रूप को प्रभावित कर सकते हैं।

सही वाक्य बनाने के लिए कर्ता, कर्म और पूरे क्रिया-पद का सम्बन्ध देखें; केवल अंतिम शब्द बदलना पर्याप्त नहीं।

मुख्य क्रिया, सहायक क्रिया और सकर्मकता

क्रिया किसी कार्य, घटना या अवस्था का बोध कराती है। ‘वह पुस्तक पढ़ रहा है’ में पढ़ने का अर्थ मुख्य क्रिया से मिलता है; ‘रहा है’ क्रिया की अवस्था और काल-संबंधी जानकारी देने में सहायक है। शब्दों की संख्या बढ़ जाने से हर पद अलग स्वतंत्र कार्य बताने वाली मुख्य क्रिया नहीं बन जाता। संयुक्त क्रिया में दूसरा क्रियापद अर्थ की विशेष छाया भी दे सकता है, जैसे ‘लिख दिया’ में कार्य के पूरा होने का भाव।

सकर्मकता पहचानने के लिए वाक्य में क्रिया और कर्म का संबंध देखें। ‘राम पुस्तक पढ़ता है’ में पुस्तक कर्म है। ‘राम सोता है’ में ऐसा कर्म अपेक्षित नहीं है। किसी वाक्य में कर्म प्रकट न होने से क्रिया का हर प्रयोग स्वतः अकर्मक नहीं बनता; संदर्भ में कर्म लुप्त भी हो सकता है। ‘वह खा रहा है’ में भोजन का उल्लेख न होने पर भी खाने की क्रिया की प्रकृति समझनी होगी।

कुछ प्रयोगों में प्रेरणा या करवाने का भाव आता है: ‘बच्चा पढ़ता है’, ‘शिक्षक पढ़ाता है’, ‘प्रधानाचार्य पढ़वाते हैं’। रूप-निर्माण और अर्थ दोनों देखें। हर शब्द में एक प्रत्यय जोड़ देने से मानक प्रेरणार्थक रूप नहीं बनता; स्वीकृत प्रयोग और क्रिया का संबंध आवश्यक है।

काल के साथ पक्ष और अन्विति भी समझें

वर्तमान, भूत और भविष्य का भेद समय-संदर्भ बताता है, लेकिन ‘वह पढ़ता है’ और ‘वह पढ़ रहा है’ दोनों वर्तमान-संदर्भ में अलग अवस्थाएँ बताते हैं। पहला सामान्य या नियमित कार्य हो सकता है, दूसरा चल रहे कार्य का बोध कराता है। ‘उसने पत्र लिखा’ पूरा हुआ कार्य बताता है। केवल सहायक क्रिया देखकर पूरे वाक्य का आशय तय न करें; समयसूचक शब्द और प्रसंग भी देखें।

हिंदी की अन्विति में ‘ने’ वाले सकर्मक पूर्णताबोधक प्रयोग महत्वपूर्ण हैं। ‘सीता ने पत्र लिखा’ में ‘लिखा’ का संबंध अप्रत्ययित पुल्लिंग कर्म ‘पत्र’ से है, जबकि ‘सीता ने चिट्ठी लिखी’ में स्त्रीलिंग कर्म के अनुसार ‘लिखी’ आता है। ‘ने’ न होने वाले हर वाक्य पर यही कर्म-आधारित नियम न लगाएँ। क्रिया का रूप केवल कर्ता के लिंग से हमेशा तय नहीं होता।

शुद्धि-अभ्यास में पहले कर्ता, कर्म, परसर्ग और क्रिया पहचानें; फिर काल तथा अन्विति जाँचें। ‘सीता पुस्तक पढ़ती है’ और ‘सीता ने पुस्तक पढ़ी’ की तुलना करें। आदेश, संभावना और शर्त बताने वाले प्रयोगों को भी केवल तीन समय-नामों में समेटना पर्याप्त नहीं है। निर्धारित पाठ्यपुस्तक के काल-भेद पढ़ते हुए उनके अर्थगत अंतर समझें।